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प्रकल्प की कल्पना एवं प्रेरणा स्त्रोत

श्री नरप‍तचन्द कानूनगो राष्ट्रीय मंत्री
(संस्कृत समूहगान एवं लोकगीत प्रतियोगिता)

 

वन्देमातरम्
श्यामलां सरलां सुस्मि‍तां भूषिताम्
धरणी भरणीयम् मारतम्

 

मैं अपनी मातृभूमि की वन्दना करता हूँ। अपनी मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरने की अभिलाषा प्रारम्भ से मन में है। कई वर्ष पूर्व अपनी मातृभूमि को छोड़कर जब हैदराबाद बसा तो मन में एक टीस थी। कब होगा इस क्षेत्र का विकास, मारवाड़ का उपेक्षित क्षैत्र, शैक्षणिक, आर्थिक व औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा जिला, चारों तरफ धोरे, रेतीली धरती, दूर-दूर तक रेत के टीले यहां की जीवन व्यवस्था सिर्फ और सिर्फ बरसात पर निर्भर। इन्द्र देवता की मेहरबानी रहे तो क्षेत्र का विकास व उसी एक फसल पर किसान जीवन निर्वाह करता है। कोई कॉलेज नहीं, कोई उद्योग धंधे नहीं। यहां का व्यक्ति धन कमाने ‍हेतु भारत के कोने-कोने में बसा है। अपनी मातृभूमि पर पैतृक आलीशान मकान लेकिन पारिवारिक विकास व धन अर्जित करने हेतु बाहर प्रवासी किसी ने इस क्षेत्र के विकास पर ध्यान नहीं दिया। ऐसे में मन में एक व्यथा, एक चिंतन लगातार चल रहा था। कैसे इस क्षेत्र का विकास हो, क्यों नहीं एक सामाजिक संस्था प्रारम्भ की जाय जिसके माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व नैतिक उत्थान संभव हो।

 

कई वर्षों की सोच के बाद निरन्तर प्रयासों से यहाँ भारत विकास परिषद् की शाखा प्रारम्भ हुई। तब लगा, एक प्लेटफार्म बन चुका है। अब इसके माध्यम से कुछ स्थायी प्रकल्प ‍हेतु प्रयास करने चाहिए। इसी बीच Marine Line JC, Mumbai से जुड़े कुछ बंधु हैदराबाद पधारे तब सभी बंधुओं को वहां की विकलांग कार्यशाला दिखाई गई। अवलोकन के बाद उसमें आए श्री प्रकाश कानूंगो जो बड़े उद्योगपति के साथ कई सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं से जुड़े होने के कारण काफी प्रभावित हुए। मैंने मेरी कल्पना, मेरी मंशा उनके सामने रखी। बाद में कई बार अन्य कार्यक्रमों में, जब भी भेंट होती, बातचीत बढ़ाते गए। तत्पश्चात मैंने उन्हे मुम्बई में राष्ट्रीय समूह गान प्रतियोगिता के अखिल भारतीय आयोजन में अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया ‍तथा भारत विकास परिषद् के कार्यों का अवलोकन करवाया जिससे काफी प्रभावित होकर इससे मानसिक रूप से जुड़ गए।

 

मेरे मित्र के साथ व्यक्तिगत अच्छे सम्बन्धों के कारण दूसरी बार फिर अंबाला में अखिल भारतीय राष्ट्रीय समू‍ह गान कार्यक्रम में आग्रह करने पर पधारे। साथ ‍ही हमारी सेवा कार्य हेतु बातचीत भी लगातार सम्प्रेषित होती रही। लगातार ऐसे कार्यक्रमों से जुड़ने पर श्री प्रकाश कानूंगो ने अपने मन की बात मुझे बताई। क्यों नहीं हैदराबाद जैसा एक विकलांग केन्द्र सांचोर में भी प्रारम्भ किया जाए। तभी साथ मिल बैठकर इस योजना पर कार्य प्रारम्भ किया व सांचोर प्रवास के समय भारत विकास परिषद् की बैठकर में इस विषय पर चर्चा हुई सभी की सहमति से इस प्रकल्प को प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया। ‍तुरंत मेरे आग्रह पर दो व्यक्तियों की खोज कर उन्हें हैदराबाद भेजा गया। जहां पर 6 माह तक हैदराबाद के टेक्नीशियन के द्वारा ट्रेनिंग दी गई। तत्पश्चा‍त् आवश्यक मशीनरी एवं कच्चे माल के साथ उन्हें सांचोर भेजा गया। अब जरूरत थी स्थान की। हमने प्रकाशजी कानूंगो के सामने निवेदन किया। तुरंत उन्होंने अपने फार्म हाऊस, हाडेचा रोड़ पर अस्थाई जगह कार्यशाला प्रारम्भ कराने हेतु उपलब्ध करवाई। सारी मशीनें, कच्चा माल व हैदराबाद से ट्रेनिंग लिए टेक्नीशियन के साथ हैदराबाद का टेक्नीशियन भी आया तथा यहाँ कार्यशाला में मशीनों को फीटिंग कर कार्य प्रारम्भ किया गया।

 

मारवाड़ व गुजरात क्षेत्रों में पत्र-पत्रिकाओं, टी.वी. केबल, होर्डिग व अन्य माध्यमों से जोरदार प्रचार प्रसार किया गया। बेनर, पोस्टर के साथ-साथ पेम्पलेट भी गांव-गांव में बाटे गए। इस प्रकार अथक प्रयासों के बाद 22 अगस्त 2005 को केन्द्र प्रारम्भ किया गया। प्रथम विकलांग भाई जो सांचोर की संस्था में मैनेजर था, जिसके एक हाथ नहीं था, उसे कृत्रिम हाथ लगाकर कार्य का शुभारम्भ किया गया। एक बार कार्य प्रारम्भ करने के पश्चात निरन्तर आगे बढ़‍ते गए, पीछे मुड़कर नहीं देखा और तब से अब तक दो वर्ष में 258 कृत्रिम अंग लगाए गए। जिसमें हाथ-पांव, कैलिपर्स बनाकर नि:शुल्क प्रदान किए गए। कार्य को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने व अधिक से अधिक के लोगों के जुड़ाव हेतु ‘चेरिटेबल ट्रस्ट’ का गठन किया गया तथा पहली बैठक का मौटो तय हुआ। ‘‘मारवाड़ क्षेत्र विकलांग मुक्त बने।’’ प्रचार प्रसार पश्चिम राज्य की बोलियों के माध्यम से किया गया। इन्हीं अथक प्रयासों के फलस्वरूप दो विशाल विकलांग कैम्प आयोजित किए गए। पहला कैम्प सुमेरपुर में 16.10.2005 को लगा जिसमें 840 विकलांग व्यक्ति लाभान्वित हुए। दूसरे कैम्प सांचोर में 31 नवम्बर 2005 को लगा जिसमें 375 बंधु लाभान्वित हुए। सुमरेपुर के कैम्प को देश में सर्वेश्रेष्ठ घोषित किया गया। जिसमें ज्यादा विकलांग बन्दुओं की भागीदारी रही। उसी समय के कई गणमान्य प्रमुख लोगों ने केन्द्र का निरीक्षण किया। कई भामाशाहों ने अपना धन देने की इच्छा प्रकट की ‍तभी विचार आया क्यों नहीं परिषद् का अपना स्वयं का भवन निर्माण करवाया जाय। अपनी दिली इच्छा श्री प्रकाशजी कानूंगो से प्रकट की। प्रकाशजी सहर्ष इसके लिए तैयार हुए और अपने पुत्र की शादी के उपलक्ष में न केवल जमीन अपितु भवन बनाकर दिया। अपने फार्म हाउस में 2550 वर्ग फीट की जगह के साथ 1650 वर्ग फीट तल मंजिल निर्माण कर अपने पुत्र की शादी के अवसर पर ट्रस्ट को भेंटकर एक अद्भूत उदाहरण प्रस्तुत किया। अपने की शादी के कार्ड में भी इसे अंकित किया। थोड़े से समयान्तराल में ही शादी से पूर्व भवन का निर्माण हुआ व 14 फरवरी को शादी की पूर्व संध्या पर उद्घाटन कार्य सम्पन्न हुआ। सारे भारत में इस कार्य की सराहना हुई। उसी समय मेरे मन में एक ओर योजना चल रही थी, हमारा क्षेत्र दूर-दूर ढाणियों में बसा है। एक तरफ पाकिस्तान से सटा हमारा क्षेत्र, हर दृष्टि से उपेक्षित रहा है। मैंने अपने परिवार से विचार विमर्श कर एक एम्बुलेंस परिषद् को देने की घोषणा की। वाहन खरीदा गया जिसमें एक डॉक्टर दवाई के साथ हर रोज एक गांव पर अपनी सेवाएं नि:शुल्क देगा। इन दोनों योजनाओं का उद्घाटन समारोह एक साथ 14 फरवरी को समाज के कई गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। कई मित्र भारत के कोने-कोने से पधारे तो विदेशों से भी प्रकाशजी के मित्र पधारे। तब विचार हुआ कि इस को स्थायी प्रकल्प व आत्मनिर्भर (आर्थिक रूप से) बनाया जाए। श्री प्रकाशजी कानूंगो ने 2 वर्ष का खर्च करीब 5 लाख देने की घोषणा की, मगर व्यय 7 लाख तक पहुंचा जो उन्होने स‍ह्दयता पूर्वक वहन किया व मोबाइल अस्पताल हेतु 25000 का प्रति माह का व्यय Sponsor की घोषणा हुई। कुछ ही समय में करीब 24 भाईयों ने प्रतिमाह का खर्च प्रदान किया। इस प्रकार यह दोनों योजनाएं अच्छी तरह कुशल टेक्नीशियन एवं डॉक्टर के साथ चल रही है। यह मोबाइल टीम सप्ताह 4 दिन स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण का कार्य करती है। अवकाश के समय मोबाइल सेवा अन्य जगह रोगियों को पहुंचाने का भी कार्य करती ‍हैं। इस प्रकार 25 वर्ष पूर्व जो स्वप्न मैंने देखा था तथा लगातार जिसके लिए दिमाग में जद्दोजहद चलता र‍ही, उन सभी कार्यों को अपने साथियों, परिषद् के सदस्यों के पूर्व किया व जीवन में देखे गए सपने को पूर्णता प्रदान होने से आत्मिक संतोष की प्राप्ति ‍हुई।

 
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